Thursday, June 28, 2012

जगामहुआ में अब खली खेत बा . लेकिन अभी जब सब तरफ यूरो कप के धूम बा हमरा गाँव के फुटबाल मन परता . ओहिजा बड़का फिल्ड रहे . जब हमनी के दूसरा तीसरा में पढ़ात होखब जा गाँव में दू गो बड़का मैदान रहे। एगो  टा ड़ी पर  आ एगो  जागा महुआ .
एह बेर गाँव गइ नी  हाता रोड लाउकल हा . पीच रोड . स्टेशन से 15 मिनट में फट से गाँवे . हाई स्कूल  भी  हो गईल  बा लगभग . बिजली  आ गईल बिया. खूब लोग टीवी के आनंद लेता . खेल के मैदान बिना सब सून लागता . आइपीएल  नियन अब खेल खातिर कटिया के इंतजार होता. यानि खेत खाली होई त खेल होई। सुननी  हा जे लोग लागल बा जल्दिये खेल के मैदानों गुलज़ार होई.

Tuesday, March 22, 2011

मथुरा आ बनारस के ना ..कमेसर के पेड़ा

हहवा पीपर हमनी के जनम से पहिले ढहि गइल रहे। लहिया पीपर हमनी के आगे ढहल। दीदोदाई, ए गो नीमि के फेंड़ कहात रहे। ओहिजे कमेसर के दोकानि रहे। रहे कहल ठीक नइखे, बिया अबहीं।
हालांकि, जब हमनी के लइका रहुईं जा, उनकर बाबूजी दुकान पर बइठत रहुअन।हमनी खातिर दुकान के नाम रहे तातो यानी ततवा के दुकानि। दुकानि बहुते छोट रहुए। घुसे के दरवाजा बिल्‍कुल बड़ दालानि के जंगला एइसनि। नीहुरि के भीतरी जाएके पड़त रहे। रासन के समान संगे पान के एकमात्र ठीहा। लेकिन पान आ, रासन से कहीं जयादा मसहूर उहां के पेड़ा रहे। अलग स्‍वाद। दुर्लभ स्‍वाद। दुनिया में सिर्फ सिंघनपुरा में आ ओहिजो सिर्फ कमेसर के दुकानि पर। ओकर स्‍वाद ओइसने रहे जइन सहतू के समोसा, आ अलगू के चाटपटी आ लकठो के। इ सब बनारस के लवंग लता और बंगाल के रसगुल्‍ला पर आजो भारी बा।
ददरी आ दसहरा में दीदो दाई तर खास चूल्‍हा जमे। घीवही और गुरही जिलेबी के। अब दीदो दाई के नीमि नइखे। ततवा के पुरनका घर भी नइखे। लेकिन ततवा के दोकानि बांचल बिया। कमेसर के बाबूजी नइखन, लेकिन उनकर पेड़ा के स्‍वाद बांचल बा। भोपाल में गांव से ले आइल रहुंवी सब पूछता कहां के पेड़ा ह। मथुरा के कि, बनारस के ...... कहि के मन खुश् होता, इ हमरा कमेसर के पेड़ा ह, हमरा गांव के पेड़ा ह।

Monday, May 3, 2010

गायब हो रहल बा गाँव

सिघनपुरा स्मृति से गायब हो रहल बा । अब ओकरा जगह पर पटना बा । बनारस बा। कोल्कता बा । भोपाल बा । दिल्ली बिया। खूब मन बा गाँव जाएके । लेकिन करीं का। छुट्टी छोट बिया । एक दू दिन में कहाँ कहाँ jaayii

Saturday, February 7, 2009

ए गो नीहोरा

अगर रउआ में से केहू के भीरी, बड़का सिंघनपुरा से जुड़ल जानकारी, अउरी लोगन के संपर्क भा ई मेल, फोन नं होखे त हमरा के एह ई ठिकाना पर पठा दीं।
lalbahadur9@yahoo.com
रउआ सब के अग्रिम आभार

ग्रामोत्‍सव 2008 की स्‍मृतियां

ग्रामोत्‍सव यानी अपना गांव में नवहन के बीच एक दिन। इ सिलसिला अक्‍तूबर 2006 में शुरू भइल। कोशिश बा कि बहरी भितरी जे भी होखे साल में कम से कम एक बार एक दिन ही खातिर आओ। सबकरा संगे मीलो भेंटो। अपना अनुभव के अपना लोगन के बीच राखे- बांटे। प्राथमिक विद्यालय बड़कासिंघनपुरा में अइसने एगो दिन के स्‍मरण बा।


छोट भाई बहिन, के उछाह देखत बनता। सबमें जाने के सीखे के बोल आ बतियावे के आपन बात कहे के गजब उत्‍साह लउकत बा।
एहिजा बिजली लइखे, सड़क आवे के इंतजार बा, स्‍कूल अब खाड़ होखे के कोशिश में बा लेकिन जबन बात एहिजा सदा से रहल बा ज्ञान के दुनिया में रहेके। उ भूख अभियो जिंदा बा।






एक मौका पर लइका लोग से ज्‍यादा बढि़ चढि़ के लइकी हिस्‍सा लीहली हा स। लेकिन लगन सबका में बा। आगि अभियो बा आंच जियवले रहे के बा।
सबके खातिर एगो मंच आ मौका चाहीं। सराहे आ तनी समझावे वाला सहयोगी हाथ। फेरु त रउआ सब। देखत रहि जाइब इहिजा का होता।



Saturday, January 10, 2009

गांव ह से गढ् ह

इ कहाउत हमनी के जब से होस संभरले बा तबे से सुनता। गांव छोडि़ के जाये के परंपरा कतना पुरान बा एकर पता लगावल तनिक कठिन काम बा। लेकिन अइन अनुमान बा कि एह गांव के अभी चउदहवीं पीढ़ी चल रहलि बिया। अइसन कहलजाला कि दू पीढ़ी के बीच के फासला 20 साल के होला। अब बढि़ गइल होई। लेकिन इ एगा पक्‍का पैमाना बा कवनो बस्ती के उमीरि पता करेके।
त हमनी के गांव के उमरी चउदह गुणा बीस यानी लगभग तीन सौ साल भइल।
हमनी का ओर गांव के जवन बनावट बा ओह में ए गो प्रमुख जाति हा बाकी सब सहायक जाति के भूमिका बा। आस पास के गांवन्हि के देखबि त एकर अंदाजा लागि जाई जइसे डुमरी में भूमिहार, छोटका राजपुर में राजपूत, चक्‍की में यादव, काजीपुर में मुसलमान आदि। लेकिन हर गांव में हर जाति के कमोबेस उपस्थिति बा।
जब से गांव बा तब से इहां उहां आवाजा‍ही बा। खास कइ के पिछला तीन चार पीढ़ी के बारे में त हमनी के जानते बानी जा। इ सब आवाजाही के कारन रोजी रोटी बा। एह वजह से चाहे ज जंहवा रहे लेकिन गांव में रहल बा ता गांव ओकरा भीतर जिंदा बा। जे गांव से निकलल बा ओकरा में से बहुत लोग के अब कवना रिश्‍ता नइखे। लेकिन उ परिवार जहां भी होई अपना बड़ जेठ से एह के गांव के बारे में सुनले जनले जरूर होई।
हम कवनो लमहर बात नइखीं कइल चाहत लेकिन हमरा इ लागता कि हमनी के जवना गांव जवार के हवा माटी पानी से बनल बानी जा, ओकरा प्रति हमनी के कुछ दाय भी होला। हालांकि मनुष्‍य के नाते पूरा धरती हमनी के घर दुआर बा आ जहां भी रहेके चाहीं ओहिजा रचि बसि के रहे के चाहीं। लेकिन जहां से निकलल बानीं जा आहिजो खातिर हमनी के सोचे के चाहीं। कवनो दान पत्‍तर के बात नइखीं करत हम खाली अतनो हो सके कि साल दू साल में एक बार ओहिजा पहुंचीं जा तबो बहुत कुछ बनी संवरी।
रउआ सब का सोचतानीं। कहां बानीं आपन बात विचार भी एह चउक पर भेज सकेनीं।
अभी अतने बाकी फेरु कभी।

Saturday, May 17, 2008

Hello

इहां सिंघनपुरा से जुड़ल खबर खबरात बा। जानीं सभे एह गांव के बारे में...;